Friday, October 10, 2025

“नोबेल के नोबल बाबू और ट्रंप ताऊ का अधूरा सपना”


सुना है दुनिया में कई देशों के युद्ध विराम करवाने का श्रेय अपने माथे पर मल-मल कर लगाने वाले स्व-घोषित शांति दूत “ट्रंप ताऊ” इस बार फिर से नोबेल पुरस्कार से चूक गए।
कारण? शायद नोबेल कमेटी ने अभी तक ट्विटर थ्रेड को आधिकारिक शांति संधि स्वीकार नहीं किया।

ट्रंप ताऊ ने तो मध्य पूर्व से लेकर कोरिया तक आधी दुनिया में शांति की घोषणा खुद ही कर दी थी। बस बाकी दुनिया को ही पता नहीं चल पाया।
उन्होंने कहा – “मैंने युद्ध रुकवा दिए थे, बस वो लोग लड़ना मान नहीं रहे थे।”
अब इसमें नोबेल कमेटी का क्या कसूर? वो बंदा तो शांति भी ऐसे करवाता है जैसे मोहल्ले का ताऊ क्रिकेट मैच के बीच में आकर कहे – “बस अब और मत खेलो, मेरी नींद खुल गई है!”

कमेटी ने सोचा होगा –
“भाई, ये आदमी खुद ही खुद को अवॉर्ड दे देगा, तो हम बीच में क्यों पडें? कहीं ऐसा न हो कि नोबेल लेने की बजाय अपने नाम से ही नया अवॉर्ड शुरू कर दे – ‘Trump Peace Prize – Sponsored by Truth Social’।”

कहा तो ये भी जा रहा है कि उन्होंने नोबेल कमेटी को चिट्ठी लिखी –
“अगर इस बार अवॉर्ड नहीं दिया तो मैं शांति नहीं, तूफ़ान फैला दूँगा!”
लेकिन कमेटी भी भारतीय माँ के मूड में थी – “पहले खाना खा, नहीं देंगे!”

खैर, दुनिया को शांति मिले न मिले,
ट्रंप ताऊ को इतना तो मिल ही चुका है —
“देसी व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की मानद उपाधि: ‘विश्व शांति का सेल्फी सम्राट।”

नोबेल मिले या न मिले,
ट्रंप ताऊ का सपना अब भी ज़िंदा है — अगले साल फिर से नाम आगे भेज देंगे, इस बार ‘Forwarded Many Times’ लिखकर। ✍️😄

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