कभी कहा जाता था कि न्याय अंधा होता है, पर अब ऐसा लगता है कि न्याय न केवल अंधा है, बल्कि बहरा और गूंगा भी हो गया है। देश के सर्वोच्च न्यायालय के शीर्ष पद पर बैठे न्यायाधीश पर अदालत में जूता चला — पर असल सवाल यह नहीं है कि जूता किसने चलाया, सवाल यह है कि ऐसा माहौल बना क्यों?
कहा जा रहा है कि यह घटना “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” की चरम सीमा है, पर सच्चाई यह है कि यह जूता किसी एक वकील का नहीं था, बल्कि करोड़ों नागरिकों की मूक चीख थी — जो वर्षों से फैसलों और फाइलों के बोझ में दबती रही है।
CJI गवई का नाम पिछले कुछ महीनों में लगातार चर्चा में रहा — चाहे वह सनातन धर्म पर दिए गए बयानों को लेकर हो, या फिर उन विवादित फैसलों को लेकर जिन्होंने जनता की आस्था को झकझोरा।
कई बार अदालत ने ऐसे निर्णय दिए जिनमें “भावनाओं” से ज़्यादा “व्याख्याओं” को महत्व मिला।
जनता ने तब भी सहा, मौन रही, लेकिन जब न्याय का पलड़ा आस्था के खिलाफ झुकता दिखा — तब समाज का धैर्य जवाब दे गया।
कभी वही न्यायालय था जो “धर्मनिरपेक्षता” की दुहाई देता था, आज उसी न्यायालय पर पक्षपात के आरोप लग रहे हैं।
कभी वही न्याय व्यवस्था थी जो “जनता की अदालत” कहलाती थी, अब जनता उससे सवाल पूछने पर “अवमानना” की धमकी झेलती है।
क्या यही लोकतंत्र का चेहरा है?
क्या न्याय अब केवल सत्ता के साथ खड़ा रहेगा और समाज के साथ नहीं?
जिन फैसलों को “ऐतिहासिक” कहा गया, वे जनता के दिलों में “विवादास्पद” बन गए।
कभी आरक्षण से जुड़ा फैसला, कभी धार्मिक संस्थाओं पर टिप्पणी, और कभी ऐसी टिप्पणियाँ जिनसे ऐसा लगा मानो सनातन धर्म ही देश के लिए बोझ हो।
पर याद रखिए, सनातन कोई संस्था नहीं — वह एक संवेदनशील चेतना है, जो हजारों वर्षों से इस भूमि की आत्मा में बसती है।
जब न्याय व्यवस्था उस चेतना से टकराती है, तो जूते नहीं चलते — जनता की चेतना जागती है।
आज वही हुआ।
एक व्यक्ति ने जूता चलाया, लेकिन गूंज पूरे देश में सुनाई दी।
यह गूंज किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं थी, यह व्यवस्था को आईना दिखाने वाली आवाज़ थी।
न्याय की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति “माननीय” हो सकता है, लेकिन वह “अपरिहार्य” नहीं।
जनता की अदालत बड़ी है, और इतिहास गवाह है कि जब जनता उठती है, तो सबसे ऊंचे सिंहासन भी हिल जाते हैं।
इसलिए, यह जूता किसी वकील का हथियार नहीं था —
यह था उस समाज की चुप्पी का अंतिम शब्द,
जो अब बोल पड़ा है —
“न्याय चाहिए, दिखावा नहीं।”